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DOI: https://doi.org/10.63345/ijre.v15.i10.3
जितेंद्र
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
सारांश (Abstract)— राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने का महत्त्वपूर्ण संकल्प व्यक्त किया है। नीति प्रारंभिक एवं उच्च शिक्षा दोनों स्तरों पर मातृभाषा/स्थानीय भाषा में अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित करती है और इसे संज्ञानात्मक विकास, सांस्कृतिक अस्मिता तथा समावेशी शिक्षा से जोड़ती है। प्रस्तुत शोध पत्र इसी संकल्प की समालोचनात्मक पड़ताल करता है और यह प्रश्न उठाता है कि मातृभाषा/हिंदी को प्रोत्साहन देने के आदर्श तथा उच्च शिक्षा में रोज़गारपरकता (employability) की यथार्थ चुनौती के बीच किस प्रकार का तनाव विद्यमान है। अध्ययन गुणात्मक एवं दस्तावेज़-आधारित प्रविधि अपनाते हुए नीति-दस्तावेज़, द्वितीयक आँकड़ों तथा पूर्ववर्ती शोध-साहित्य का विश्लेषण करता है। निष्कर्ष यह है कि मातृभाषा में शिक्षा शैक्षिक गुणवत्ता एवं समझ की दृष्टि से लाभकारी है, किंतु जब तक रोज़गार-बाज़ार, उच्च-स्तरीय ज्ञान-संसाधन तथा व्यावसायिक क्षेत्रों में भाषिक अवसरों का विस्तार नहीं होता, तब तक केवल माध्यम-परिवर्तन रोज़गारपरकता की समस्या का समाधान नहीं कर सकता। पत्र यह प्रतिपादित करता है कि मातृभाषा-प्रोत्साहन और रोज़गारपरकता परस्पर-विरोधी नहीं, बल्कि पूरक लक्ष्य हो सकते हैं, बशर्ते अनुवाद, शब्दावली-निर्माण, द्विभाषिक दक्षता एवं भाषिक आर्थिकी पर समन्वित रूप से कार्य किया जाए। अंत में नीति, पाठ्यक्रम एवं भविष्य के शोध हेतु सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।
मुख्य शब्द (Keywords)— राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020; मातृभाषा; हिंदी; शिक्षा का माध्यम; रोज़गारपरकता; उच्च शिक्षा; बहुभाषिकता; भाषिक आर्थिकी
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