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DOI: https://doi.org/10.63345/ijre.v8.i1.1
डॉ गीता दुबे
सहायक प्राध्यापक ( हिंदी)
ब्रह्मावर्त पी•जी• कालेज मंधना, कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश,
छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय,कानपुर नगर
सार— हिंदी साहित्य का विकास केवल रचनात्मक अभिव्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उसके साथ-साथ आलोचनात्मक चेतना भी निरंतर विकसित होती रही है। आलोचना ने साहित्य को दिशा देने, उसके मूल्यों का मूल्यांकन करने तथा समाज और युग की चेतना से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। प्रस्तुत शोध-पत्र हिंदी साहित्य में आलोचनात्मक चेतना के विकास का अध्ययन करते हुए विशेष रूप से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के वैचारिक प्रतिमानों का विश्लेषण करता है।
आचार्य द्विवेदी ने हिंदी आलोचना को भाषिक शुद्धता, तार्किक विवेचना और सामाजिक उपयोगिता से जोड़ा। उनके विचारों में साहित्य केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि समाज-सुधार और बौद्धिक जागरण का माध्यम है। उन्होंने आलोचना को अनुशासन, विवेक और वस्तुनिष्ठता प्रदान की। इसके विपरीत, निराला की आलोचनात्मक चेतना भावात्मक, आत्मानुभूति-प्रधान और विद्रोही स्वभाव की है। उनके साहित्य में सामाजिक यथार्थ, मानवीय पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है, जिससे आलोचना में संवेदनात्मक और वैचारिक गहराई आती है।
यह शोध द्विवेदी और निराला के विचारों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि हिंदी आलोचना का विकास केवल एकरेखीय नहीं, बल्कि विविध दृष्टिकोणों से समृद्ध प्रक्रिया रही है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि द्विवेदी की बौद्धिक अनुशासनशीलता और निराला की वैचारिक स्वतंत्रता ने मिलकर हिंदी साहित्य को सशक्त, जागरूक और युगबोध से सम्पन्न आलोचनात्मक चेतना प्रदान की।
बीज शब्द: हिंदी साहित्य, आलोचनात्मक चेतना, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हिंदी आलोचना का विकास, वैचारिक प्रतिमान, सामाजिक चेतना, साहित्यिक मूल्यांकन, युगबोध, आधुनिक हिंदी साहित्य
सन्दर्भ सूची
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