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DOI: https://doi.org/10.63345/ijre.v15.i7.6
डॉ. पूजा दुबे
सहायक प्राध्यापक
संत हरकेवल शिक्षा महाविद्यालय,
अम्बिकापुर, सरगुजा, (छ.ग.)
सारांश :– डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार – शिक्षा को मनुष्य और समाज निर्माण करना चाहिए। इस कार्य के बिना अनुभव और अपूर्ण है। शिक्षा सर्वांगीण विकास से संबंधित है। शिक्षा द्वारा मनुष्य अपने वातावरण से समायोजन करने का प्रयास करता है। शिक्षा को तभी सफल माना जाता है, जब वह व्यक्ति के व्यवहारों को परिभाषित करने में सफल हो सके। मानव जीवन में उत्तेजना ही संवेग है। यदि संवेगों का विकास संतुलित रूप में नहीं हो पाता है तो व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है। बालक के संवेगात्मक विकास और व्यवहार का आधार है, उसके प्रेम, हर्ष और उत्सुकता आदि भाव जो बालक के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में योग देते हैं। जबकि भय, क्रोध और ईर्ष्या आदि निन्दनीय संवेग उसके विकास को विकृत एवं कुण्ठित कर देती है। विद्यालय की शैक्षिक प्रक्रियाओं में संवेगात्मक अस्थिरता के कारण उत्पन्न विद्यार्थी के आचरण की समस्या को प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है। मानो यह कोई बाह्य तत्व है, जो शिक्षण के उत्तरदायित्व के क्षेत्र का विषय नहीं है। उत्तरदायित्व को यह अवबोध संवेगात्मक रूप से अस्थिर बालक को एक प्रभावशाली विद्यार्थी बनने से वंचित कर सकता है।
शब्द कुंजी :– संवेग, उत्तेजना, संवेगात्मक अस्थिरता, संवेगात्मक परिपक्वता, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया।
संदर्भित ग्रंथ :–
- हमीद, ए., एवं पाहिजा, के. के. (2010). शिक्षक प्रशिक्षार्थियों की संवेगात्मक परिपक्वता का अध्ययन। एडुट्रैक, खंड–10, अंक–03, पृ. सं. 43–55।
- आदित्य, एस., एवं जैन, पी. (2009). संवेगात्मक परिपक्वता का अध्ययन : एकल एवं संयुक्त परिवार के छात्रों पर। एडुट्रैक, खंड–72, अंक–01, पृ. सं. 50–51।
- जोशी, आर., गुप्ता, एवं जैन तोमर, एस. (2009). किशोरों की संवेगात्मक परिपक्वता पर अध्ययन। एडुट्रैक, खंड–72, अंक–01, पृ. सं. 69–89।